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बस रहा है नज़र में मदीना

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क़ाफ़िले सू-ए-तयबा चले हैं, आज फिर से मैं तन्हा खड़ा हूँजा सका न मैं अब के भी, मौला ! बस यही सोच कर रो रहा हूँबस रहा है नज़र में मदीना, दिल में अरमान है हाज़िरी के

क़ाफ़िले सू-ए-तयबा चले हैं, आज फिर से मैं तन्हा खड़ा हूँ

जा सका न मैं अब के भी, मौला ! बस यही सोच कर रो रहा हूँ

बस रहा है नज़र में मदीना, दिल में अरमान है हाज़िरी के

रोते रोते, मदीने के वाली ! बीत जाएँ न दिन ज़िंदगी के

मेरा जीना भी है कोई जीना, दूर है मुझ से तेरा मदीना

जीते-जी वो घड़ी भी तो आए, देख लूँ जल्वे तेरी गली के

बस रहा है नज़र में मदीना, दिल में अरमान है हाज़िरी के

रोते रोते, मदीने के वाली ! बीत जाएँ न दिन ज़िंदगी के

मेरी उम्मत पे कर दे ‘अताएँ, बख़्श दे इन की सारी ख़ताएँ

मुस्तफ़ा कर रहे हैं दु’आएँ, बख़्त देखो ज़रा उम्मती के

हुज़ूर ! ऐसा कोई इंतिज़ाम हो जाए

सलाम के लिए हाज़िर ग़ुलाम हो जाए

हुज़ूर आप जो चाहें तो कुछ नहीं मुश्किल

सिमट के फ़ासिला ये चंद-गाम हो जाए

मदीने जाऊँ, फिर आऊँ, दुबारा फिर जाऊँ

ये ज़िंदगी मेरी यूँही तमाम हो जाए

बस रहा है नज़र में मदीना, दिल में अरमान है हाज़िरी के

रोते रोते, मदीने के वाली ! बीत जाएँ न दिन ज़िंदगी के

ग़म के मारों का तू आसरा है, तू नियाज़ी का मुश्किल-कुशा है

मेरे मौला ! मुझे इतना दे दे, हर बरस लूँ मज़े हाज़िरी के

बस रहा है नज़र में मदीना, दिल में अरमान है हाज़िरी के

रोते रोते, मदीने के वाली ! बीत जाएँ न दिन ज़िंदगी के

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