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दुनिया के ऐ मुसाफिर मंजिल तेरी कब्र है

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दुनिया के ऐ मुसाफिरमंज़िल तेरी क़ब्र हैतय कर रहा है जो तू

दुनिया के ऐ मुसाफिर

मंज़िल तेरी क़ब्र है

तय कर रहा है जो तू

दो दिन का ये सफ़र है

दुनिया बनी हे जब से

लाखों करोड़ो आये

बाकी रहा ना कोई

मिट्टी में सब समाये

इस बात को ना भूलो

सब का यही हश्र हे

दुनिया के ऐ मुसाफिर...

आँखों से तूने अपनी

कितने जनाज़े देखे

हाथो से तूने अपने

दफ़नाये कितने मुर्दे

अंजाम से तू अपने

क्यूं इतना बेखबर हे

दुनिया के ऐ मुसाफिर...

मखमल पे सोने वाले

मिट्टी में सो रहे हे

शाहो गदा बराबर

एक साथ सो रहे हे

दोनो हुवे बराबर

यही मौत का असर है

दुनिया के ऐ मुसाफिर...

ये आली-शान बंगले

कुछ काम के नही हे

ये ऊंची ऊंची इमारत

कुछ काम की नहीं है

दो गज ज़मीन का टुकड़ा

छोटा सा तेरा घर हे

दुनिया के ऐ मुसाफिर...

मिट्टी के पुतले तुझ को

मिट्टी में ही सुमाना

एक दिन वह तू के आया

एक दिन वह तुझ को जाना

रहना नहीं हे तुझ को

जारी तेरा सफ़र हे

दुनिया के ऐ मुसाफिर...

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