अल-मदद पीरान-ए-पीर , या गौस-ए-आ'ज़म दस्तगीर !
अल-मदद पीरान-ए-पीर, ग़ौस-ए-आ़ज़म दस्तगीर!
रुतबा ये विलायत में, क्या ग़ौस ने पाया है
अल्लाह ने वलियों का, सुल्तान बनाया है
है दस्त-ए-अली सर पर, हसनैन का साया है
मेरे ग़ौस ने ठोकर में, मुर्दों को जिलाया है
अल-मदद पीरान-ए-पीर, ग़ौस-ए-आ़ज़म दस्तगीर!
लाखों ने उसी दर से, तक़दीर बनाई है
बग़दाद संवरिया की, हर बात निराली है
डूबी हुई कश्ती भी, दरिया से निकाली है
ये नाम अदब से लो, ये नाम जलाली है
अल-मदद पीरान-ए-पीर, ग़ौस-ए-आ़ज़म दस्तगीर!
हम ग़ौस की महफ़िल को ता-हश्र सजाएंगे
हम ग़ौस का लंगर भी ता-उम्र पकाएंगे
बस्ती में ग़रीबों को, भूखों को खिलाएंगे
फिर ग़ौस अगर चाहें, बग़दाद भी जाएंगे
अल-मदद पीरान-ए-पीर, ग़ौस-ए-आ़ज़म दस्तगीर!
अंदाज़ बयां उनका, हम कर नहीं पाएंगे
अजमेर से होकर हम बग़दाद को जाएंगे
जब आए बला सर पर, हम उनको पुकारेंगे
तुम दिल से सदा तो दो, वो हाथ बढ़ाएंगे
अल-मदद पीरान-ए-पीर, ग़ौस-ए-आ़ज़म दस्तगीर!
जुब्बे को चुराने की, नीयत से जो आया था
सुनसान अंधेरे का, जो लाभ उठाया था
या ग़ौस! दुआ करके, मालिक से निदा करके
तुमने ही उसे रब का महबूब बनाया था
अल-मदद पीरान-ए-पीर, ग़ौस-ए-आ़ज़म दस्तगीर!
हर फ़िक्र से तुम होकर आज़ाद चले जाओ
लेकर के लबों पर तुम, फ़रियाद चले जाओ
मिलना है अगर तुमको, वलियों के शहंशाह से
ख़्वाजा से इजाज़त लो, बग़दाद चले जाओ
अल-मदद पीरान-ए-पीर, ग़ौस-ए-आ़ज़म दस्तगीर!
बच्ची भी सलामत है, बच्चा भी सलामत है
हर एक बराती का कुम्बा भी सलामत है
फ़रमान तुम्हारा यूं दरिया की तरफ पहुंचा
दुल्हन भी सलामत है, दूल्हा भी सलामत है
अल-मदद पीरान-ए-पीर, ग़ौस-ए-आ़ज़म दस्तगीर!
एक बार बुलाया था, एक बार बुलाएंगे
एक रोज़ यक़ीनन हम, बग़दाद को जाएंगे
बचपन से मेरी माँ ने मुझको ये सिखाया है
जब आए कोई आफ़त, या ग़ौस! पुकारा है
अल-मदद पीरान-ए-पीर, ग़ौस-ए-आ़ज़म दस्तगीर!
मिलने को शमा' से ये, परवाना तड़पता है
क़िस्मत के अंधेरों में, दीवाना भटकता है
इसे इश्क़-ए-हक़ीक़ी में, इतना तो असर आए
जब बंद करूं आंखें, बग़दाद नज़र आए
अल-मदद पीरान-ए-पीर, ग़ौस-ए-आ़ज़म दस्तगीर!







