है इतनी शदीद अब तो तमन्ना-इ-मदीना
हर सांस से आती है सदा हाए मदीना
जागूँ तो इसी धुन में रहूं रात गए तक
सो जाऊं तो ख़्वाबों नज़र आये मदीना
मत और किसी शहर की रूदाद सुनाओ
शैदा-इ-मदीना हूँ में शैदा-इ-मदीना
मक्का तू भी अफ़ज़ल है मगर इतना बता दे
हर शहर से बड़ कर मुझे क्यों भाए मदीना
हो जाए अता रखते सफर इज़्ने सफर भी
हो जाए करम मुझपे अब आक़ा-इ-मदीना
ख्वाहिश है के अब जाके लौटूं में वहां से
नाज़िश जो तक़दीर जो दिखलाए मदीना
हर सांस से आती है सदा हाए मदीना
जागूँ तो इसी धुन में रहूं रात गए तक
सो जाऊं तो ख़्वाबों नज़र आये मदीना
मत और किसी शहर की रूदाद सुनाओ
शैदा-इ-मदीना हूँ में शैदा-इ-मदीना
मक्का तू भी अफ़ज़ल है मगर इतना बता दे
हर शहर से बड़ कर मुझे क्यों भाए मदीना
हो जाए अता रखते सफर इज़्ने सफर भी
हो जाए करम मुझपे अब आक़ा-इ-मदीना
ख्वाहिश है के अब जाके लौटूं में वहां से
नाज़िश जो तक़दीर जो दिखलाए मदीना
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