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हम सुन्नी तो आला हज़रत वाले हैं

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शुक्र-ए-ख़ुदा कि रज़वी रंगत वाले हैंहम सुन्नी तो आ'ला हज़रत वाले हैंहुब्ब-ए-नबी और हुब्ब-ए-सहाबा में चल कर
शुक्र-ए-ख़ुदा कि रज़वी रंगत वाले हैं
हम सुन्नी तो आ'ला हज़रत वाले हैं

हुब्ब-ए-नबी और हुब्ब-ए-सहाबा में चल कर
'इश्क़-ए-'अली भी दिल में चलते हैं रख कर
अहल-ए-बैत की दिल से चाहत वाले हैं
हम सुन्नी तो आ'ला हज़रत वाले हैं

आ'ला हज़रत वाले हैं, आ'ला हज़रत वाले हैं
आ'ला हज़रत वाले हैं, आ'ला हज़रत वाले हैं

जिन को न क़ुरआँ में दिखे आक़ा की शान
जिन को न आता है समझ कंज़-उल-ईमान
वो नज्दी तो क़ौम-ए-ग़लाज़त वाले है
हम सुन्नी तो आ'ला हज़रत वाले हैं

शुक्र-ए-ख़ुदा कि रज़वी रंगत वाले हैं
हम सुन्नी तो आ'ला हज़रत वाले हैं

बस्ती-बस्ती, करिया-करिया का ना'रा
इस ना'रे से गूँज उठा 'आलम सारा
सुन लो हम तो ताज-ए-शरी'अत वाले हैं
हम सुन्नी तो आ'ला हज़रत वाले हैं

शुक्र-ए-ख़ुदा कि रज़वी रंगत वाले हैं
हम सुन्नी तो आ'ला हज़रत वाले हैं

जिस ने पिलाया 'इश्क़-ए-रज़ा का जाम हमें
और सिखाया प्यारे रज़ा का नाम हमें
उस मुर्शिद की दिल से उल्फ़त वाले हैं
हम सुन्नी तो आ'ला हज़रत वाले हैं

आ'ला हज़रत वाले हैं, आ'ला हज़रत वाले हैं
आ'ला हज़रत वाले हैं, आ'ला हज़रत वाले हैं

शान से हम तो कहते हर-दम रहते हैं
जो भी रज़ा के नाम से जलते रहते हैं
उन की जलन में वज्ह-ए-कसरत वाले हैं
हम सुन्नी तो आ'ला हज़रत वाले हैं

शुक्र-ए-ख़ुदा कि रज़वी रंगत वाले हैं
हम सुन्नी तो आ'ला हज़रत वाले हैं

पीर मिला 'अत्तार हमें जग में आ'ला
रज़वी, ज़ियाई, क़ादरी जिस ने कर डाला
बेख़ुद ! हम तो ऐसी क़िस्मत वाले हैं
हम सुन्नी तो आ'ला हज़रत वाले हैं

शुक्र-ए-ख़ुदा कि रज़वी रंगत वाले हैं
हम सुन्नी तो आ'ला हज़रत वाले हैं

आ'ला हज़रत वाले हैं, आ'ला हज़रत वाले हैं
आ'ला हज़रत वाले हैं, आ'ला हज़रत वाले हैं


शायर:
वसीम बेख़ुद

ना'त-ख़्वाँ:
क़ुरैशी ब्रदर्स
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