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हो करम, सरकार अब तो हो गए ग़म बे-शुमार

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हो करम सरकार अब तो हो गए ग़म बे-शुमार.जान-ओ-दिल तुम पर फ़िदा ए दो जहाँ के ताजदार.

हो करम सरकार अब तो हो गए ग़म बे-शुमार.
जान-ओ-दिल तुम पर फ़िदा ए दो जहाँ के ताजदार.

मैं अकेला और मसाइल जिंदगी के बे-शुमार.
आप ही कुछ कीजिए ना ए शहे आली वक़ार.

याद आता है तवाफ़े ख़ाना-ए-काबा मुझे.
और लिपटना मुल्तज़ीम से वालिहाना बार बार.

संगे अस्वद चूम कर मिलता मुझे कैफ़ो सुरूर.
चैन पाता देख कर दिल मुस्तजाब-ओ-मुस्तजार.

जा रहा है क़ाफ़िला तयबा नगर रोता हुआ.
मैं रह जाता हूँ तन्हा, ए हबीब-ए-किर्दगार.

जल्द फिर तुम लो बुला और सब्ज़ गुम्बद दो दिखा.
हाज़री की आरज़ू ने कर दिया फिर बे-क़रार.

चूम कर ख़ाक-ए-मदीना झूमता फिरता था मैं.
याद आते हैं मदीने के मुझे लैल-ओ-नहार.

गुम्बद-ए-ख़ज़रा के जल्वे और वो इफ़्तारियाँ.
याद आती है बहुत रमज़ान-ए-तयबा की बहार.

या रसूलल्लाह सुन लीजे मेरी फ़रियाद को.
कौन है जो कि सुने तेरे सिवा मेरी पुकार.

हाल पर मेरे करम की इक नज़र फ़रमाइए.
दिल मेरा ग़मगीन है, ए ग़मज़दों के ग़म-गुसार.

क़ाफ़िले वालो सुनो याद आए तो मेरा सलाम.
अर्ज़ करना रोते रोते हो सके तो बार बार.

ग़मज़दा यूँ न हुआ होता उबैद-ए-क़ादरी
इस बरस भी देखता गर सब्ज़-गुम्बद की बहार.

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