लोह मदीने की तजल्ली से लगाए हुए हैं
दिल को हम मतला-इ-अनवार बनाये हुए हैं
एक जलक आज दिखा अये गुम्बदे ख़ज़रा के मकीं
कुछ भी हैं दूर से दीदार को आये हुए हैं
कश्तियाँ अपनी किनारे लगाए हुए हैं
क्या वो डूबे जो मुहम्मद के तिराये हुए हैं
शर्मो ईस्यां से नहीं सामने जाया जाता
क्या यही काम है तेरे शहर में आये हुए हैं
क्यों न पलड़ा तेरे आमाल का भरी हो नसीम
अब तो सरकार भी मीज़ान पे आये हुए हैं
लोह मदीने की तजल्ली से लगाए हुए हैं

लोह मदीने की तजल्ली से लगाए हुए हैंदिल को हम मतला-इ-अनवार बनाये हुए हैंएक जलक आज दिखा अये गुम्बदे ख़ज़रा के मकींकुछ भी हैं दूर से दीदार को आये हुए हैं
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