मदीने वाले का जो भी ग़ुलाम हो जाए
क़सम ख़ुदा की वो 'आली-मक़ाम हो जाए
नबी के 'इश्क़ का जिस दिल में दाग़ रौशन हो
तो उस पे आतिश-ए-दोज़ख़ हराम हो जाए
मेरे दिल में 'इश्क़-ए-हुज़ूर है
मैं जहाँ में सब से अमीर हूँ
मुझे ताजदारी से क्या ग़रज़
मैं दर-ए-नबी का फ़क़ीर हूँ
मेरे दिल में 'इश्क़-ए-हुज़ूर है
मैं जहाँ में सब से अमीर हूँ
मेरे दिल में 'इश्क़-ए-हुज़ूर है
लहद में 'इश्क़-ए-मुहम्मद का दाग़ रखता हूँ
अँधेरी क़ब्र में रौशन चराग़ रखता हूँ
मैं ग़ुलाम-ए-पंजतन-ए-पाक हूँ
मैं दर-ए-बतूल की ख़ाक हूँ
मैं हसन-हुसैन का हूँ गदा
मैं सग-ए-जनाब-ए-अमीर हूँ
मेरे दिल में 'इश्क़-ए-हुज़ूर है
मैं जहाँ में सब से अमीर हूँ
मेरे दिल में 'इश्क़-ए-हुज़ूर है
ख़ालिक़ ने मुझ को मेरी तलब से सिवा दिया
सरमायादार-ए-'इश्क़-ए-मुहम्मद बना दिया
मुझे मेहर-ओ-माह से हो काम क्या
तेरे नक़्श-ए-पा पे मैं हूँ फ़िदा
मुझे क्या रिहाई से वास्ता
तेरी ज़ुल्फ़ का मैं असीर हूँ
मेरे दिल में 'इश्क़-ए-हुज़ूर है
मैं जहाँ में सब से अमीर हूँ
मेरे दिल में 'इश्क़-ए-हुज़ूर है
कभी मेरे ज़ुल्मत-कदे में आ
इसे अपने नूर से जगमगा
मैं अज़ल के रोज़ से मुंतज़िर
तेरा, ऐ सिराज-ए-मुनीर ! हूँ
मेरे दिल में 'इश्क़-ए-हुज़ूर है
मैं जहाँ में सब से अमीर हूँ
मेरे दिल में 'इश्क़-ए-हुज़ूर है
ये 'अता है 'इश्क़-ए-हुज़ूर की
मुझे जिस ने ऐसी हयात दी
जो न बुझ सके वो चराग़ हूँ
जो न मिट सके वो लकीर हूँ
मेरे दिल में 'इश्क़-ए-हुज़ूर है
मैं जहाँ में सब से अमीर हूँ
मेरे दिल में 'इश्क़-ए-हुज़ूर है
जिसे कहिए जूद-ओ-करम की जा
वो है दर जहाँ में हुज़ूर का
उसी दर से मुझ को ख़ुदा मिला
उसी आस्ताँ का फ़क़ीर हूँ
मेरे दिल में 'इश्क़-ए-हुज़ूर है
मैं जहाँ में सब से अमीर हूँ
मेरे दिल में 'इश्क़-ए-हुज़ूर है
शह-ए-यसरिबी तेरे हुस्न की
किसे ताब जो करे हम-सरी
न गुलों में ऐसी शगुफ़्तगी
न ये रंग-ओ-बू, न ये ताज़गी
तेरी मिस्ल कोई हुवा न हो
तेरे सदक़े जाऊँ मैं, या नबी
मैं हूँ साजिद-ए-दर-ए-मुस्तफ़ा
ये मेरे हुज़ूर की है 'अता
कहाँ उन का दर, कहाँ मेरा सर
मैं तो इक ग़ुलाम-ए-हक़ीर हूँ
मेरे दिल में 'इश्क़-ए-हुज़ूर है
मैं जहाँ में सब से अमीर हूँ
मेरे दिल में 'इश्क़-ए-हुज़ूर है

मेरे दिल में इश्क़-ए-हुज़ूर है | इश्क़-ए-मुहम्मद
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