पुल से उतारो रह गुज़र को खबर न हो
जिब्रील पर बिछाएँ तो पर को खबर न हो
काँटा मेरे जिगर से गमे रोज़गार का
यूँ खींच लीजिये के जिगर को खबर न हो
फ़रियाद उम्मती जो करें हाले जार में
मुमकिन नहीं के खैरे बशर को खबर न हो
कहती थी बुरक से उसकी सबक़ रवि
यूँ जाइये के घरदे सफर को खबर न हो
ऐसा गुमा दे उनकी विला में खुदा हमें
ढूंढा करे पर अपनी खबर को खबर न हो
ए खारे तैयबा ! देख के दामन न भीग जाए
यूँ दिल में आ के दीदा-इ-तार को खबर न हो
ए शोके दिल ! ये सज्दा जो उनको रवा नहीं
अच्छा वो सजदा कीजिये के सर को खबर न हो
उन के सिवा रज़ा कोई हामी नहीं जहाँ
गुज़रा करे पिसर पे पदर को खबर न हो

पुल से उतारो रह गुज़र को खबर न हो
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