क़ब्र जिस दम मेरी तैयार कराई जाए
ख़ाक थोड़ी सी मदीने की भी डाली जाए
आब-ए-ज़मज़म हो मयस्सर तो ग़ुस्ल दे देना
चादर-ए-कफ़न भी तैबा से मंगाई जाए
इतनी गहरी हो लहद के मैं खड़ा हो जाऊँ
दीद जिस दम मुझे आका की कराई जाए
चश्म-ए-बद क़ाबिल-ए-दीदार बनाने के लिए
ख़ाक-ए-पा थोड़ी सी आँखों में लगाई जाए
जब जनाज़े की मेरे लेकर चलें मेरे रक़ीब
नात-ए-सरकार मुझे वहाँ भी सुनाई जाए
हमको काँटा भी चुभे दर्द उन्हें होता है
अए मलक! रूह मेरी धीरे से निकाली जाए
क्या ही अच्छा हो के सलमान का भरम रह जाए
चादर-ए-कफ़न न चेहरे से हटाई जाए
नक़्श-ए-नालैन-ए-नबी सर पे मेरे रख देना
यही सूरत है के सूरत ये दिखाई जाए
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