तेरे करम की क्या बात मौला !
तेरे हरम की क्या बात मौला !
ता-उम्र कर दे आना मुक़द्दर
अल्लाहु अकबर , अल्लाहु अकबर
रब्ब मुझको बुलाएगा , मैं का'बे को देखूंगा
वो दिन भी तो आएगा , मैं का'बे को देखूंगा
रमज़ान मुबारक में , वो सामने का'बे के
इफ्तार कराएगा , मैं का'बे को देखूंगा
वो दिन भी तो आएगा , मैं का'बे को देखूंगा
तेरे करम की क्या बात मौला !
तेरे हरम की क्या बात मौला !
मायूस नहीं हूँ मैं , अल्लाह की रहमत से
वो हज पे बुलाएगा , मैं का'बे को देखूंगा
वो दिन भी तो आएगा , मैं का'बे को देखूंगा
का'बे पे पड़ी जब पहेली नज़र , क्या चीज़ है दुनिया भूल गया
यूँ होश-ओ-ख़िरद मफ़लूज़ हुए , दिल ज़ौक़-ए-तमाशा भूल गया
पहुंचा जो हरम की चौखट पर , एक अब्र-ए-करम ने गैर लिया
बाकी न रहा फिर होश मुझे , क्या माँगा क्या क्या भूल गया
जब पहेली नज़र मेरी , उस का'बे पे जायेगी
दिल झूम सा जाएगा , मैं का'बे को देखूंगा
वो दिन भी तो आएगा , मैं का'बे को देखूंगा
तेरे करम की क्या बात मौला !
तेरे हरम की क्या बात मौला !
इन साँसों के रुकने से , और मौत के आने से
वो पहले बुलाएगा , मैं का'बे को देखूंगा
वो दिन भी तो आएगा , मैं का'बे को देखूंगा
मैं का'बे की चौखट को , हाथों से पकड़ लूंगा
दिल मेरा भर आएगा , मैं का'बे को देखूंगा
वो दिन भी तो आएगा , मैं का'बे को देखूंगा
तेरे करम की क्या बात मौला !
तेरे हरम की क्या बात मौला !
बे-ताबी-ए-हाल-ए-दिल परवाने से मत पूछो
जब लम्हा वो आएगा , मैं का'बे को देखूंगा
वो दिन भी तो आएगा , मैं का'बे को देखूंगा
तेरे करम की क्या बात मौला !
तेरे हरम की क्या बात मौला !







