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रब्ब-ए-सल्लिम की सदाएं गुन-गुनाते जाएंगे

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रब्ब-ए-सल्लिम की सदाएं गुन-गुनाते जाएंगेरब्ब-ए-हब्ली उम्मती की रट लगाते जाएंगेहम गुनाहगारों को रब्ब से बख्शवाते जाएंगे

रब्ब-ए-सल्लिम की सदाएं गुन-गुनाते जाएंगे

रब्ब-ए-सल्लिम की सदाएं गुन-गुनाते जाएंगे
रब्ब-ए-हब्ली उम्मती की रट लगाते जाएंगे
हम गुनाहगारों को रब्ब से बख्शवाते जाएंगे
 
पेश-ए-हक़ मुज़्दा शफा'अत का सुनाते जाएंगे
आप रोते जाएंगे हमको हसाते जाएंगे
 
मरकज़-ए-रहमत बनाया मस्कन-ए-महबूब को
फूल जन्नत का दिया है गुलशन-ए-महबूब को
नूर का पैकर बनाया है तन-ए-महबूब को
 
वुस'अतें दी हैं ख़ुदा ने दामन-ए-महबूब को
जुर्म खुलते जाएंगे और वो छुपाते जाएंगे
 
जुमला अस्लाफ-ओ-अकाबिर , सारे असहाब-ए-उलूम
कर चुके हैं बारवी के जश्न को जाइज़ हुकुम
इस लिए तो कह रहा है अहल-ए-सुन्नत का हुजूम
 
हश्र तक डालेंगे हम पैदाइश-ए-मौला की धूम
मिस्ल-ए-फारस नज्द के कील'ए गिराते जाएंगे
 
जान-ए-रहमत , शान-ए-रहमत हैं जनाब-ए-मुस्तफा
रहमतुल्लिल-आ'लमीं , क़ुरआन ने जिनको कहा
बन के हैं गोहर जो आये हैं सरापा मो'जिज़ा
 
ख़ाक हो जाए 'अदू जल कर मगर हम तो रज़ा
दम में जब तक दम है ज़िक्र उनका सुनाते जाएंगे
 
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