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रूह-ए-शब्बीर वो मंजर तो बता

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रूह-ए-शब्बीर वो मंजर तो बताजब हुई शहर-ए-मदीना से जुदाई होगीये तो ज़ैनब ही बता सकती हैलौट कर कैसे मदीने में वो आई होगी

रूह-ए-शब्बीर वो मंजर तो बता

रूह-ए-शब्बीर वो मंजर तो बता
जब हुई शहर-ए-मदीना से जुदाई होगी
ये तो ज़ैनब ही बता सकती है
लौट कर कैसे मदीने में वो आई होगी

कर के रोज़े की तरफ चेहरा ये बोले शब्बीर
हम रहें या न रहें नाना हुज़ूर
हश्र तक आपकी उम्मत की भलाई होगी
रूह-ए-शब्बीर...........

लाश अकबर की उठा लाए जो ख़ैमों में हुसैन
शहरबानो ही बता सकती है
किस गज़ब की वो क़यामत थी जो टूटी होगी
रूह-ए-शब्बीर...........

जलते ख़ैमों में झुलसती वो सकीना मासूम
अरे फ़लक तूने ये कैसे देखा
तुरबत-ए-ज़हरा मदीने में दहलती होगी
रूह-ए-शब्बीर...........

रख के लाशों को क़तरों में ये बोले शब्बीर
तू जो राज़ी है तो हम राज़ी हैं
सारे तस्लीम के तेरी यही मरज़ी होगी
रूह-ए-शब्बीर...........

होके तैयार चले शाह जो कर्बला की तरफ
ये सकीना को कोई जा देखे
किस तरह गोड़े की टांगों से वो लिपटी होगी
रूह-ए-शब्बीर...........

नूर को हश्र में रखना है सगों में शब्बीर
तेरी राहों में पड़ा होगा कहीं
आस एक नज़र-ए-इनायत की लगाई होगी
रूह-ए-शब्बीर...........

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