कुछ खौफ रोज़े महशर का उबैद को हो क्यूँया गौस मेरे मुर्दा दिल को जिला दो आकर
ठोकर से तुमने अपनी मुर्दों को है जिलाया
या गौस मुझको बेहरे ईस्यां से तुम निकालो
जैसे के डूबी कश्ती को दो पल में है निकाला
इज़्ने खुदा से तुमने मुर्दे किये हैं ज़िंदा
बारा बरस की डूबी कश्ती को है निकाला
हसनी हुसैनी गुलशन के हो महकते फूल
ज़हरा का लाडला तू मौला का तू प्यारा
कर
गर्दन में इसकी पत्ता या गौस है तुम्हारा
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