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याद ए मुस्तफा ऐसी बस गयी है सीने में

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याद-ए-मुस्तफा ऐसी बस गयी है सीने मेंजिस्म हो कहीं अपना, दिल तो है मदीने में

याद-ए-मुस्तफा ऐसी बस गयी है सीने में

जिस्म हो कहीं अपना, दिल तो है मदीने में
 
जब से मिल गया मुझको नाखुदा मदीने में
ली पनाह तूफ़ान ने खुद मेरे सफ़ीने में
 
उन ग़ुलों की खुशबु का ज़िक्र करूँ आक़ा
खुल्द भी नहाती है आपके पसीने में
 
कौन सी ज़मीं उनके आशिक़ों से खाली है
हर जगह हैं परवाने, शम'आ है मदीने में
 
खौफ न कर महशर का, ग़म न कर उक़्बा का
नाम-ए-मुस्तफा लिख कर, डाल दो सफ़ीने में
 
बात ये यकीं है की वो मुझे बुलाएंगे
जाने कौन से सन में, जाने किस महीने में
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