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गुज़रे जिस राह से वोह सय्यिदे वाला हो कर

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गुज़रे जिस राह से वोह सय्यिदे वाला हो कररह गई सारी ज़मीं अ़म्बरे सारा हो कररुख़े अनवर की तजल्ली जो क़मर ने देखी

गुज़रे जिस राह से वोह सय्यिदे वाला हो कर

रह गई सारी ज़मीं अ़म्बरे सारा हो कर


रुख़े अनवर की तजल्ली जो क़मर ने देखी

रह गया बोसा दहे नक़्शे कफ़े पा होकर


वाए मह़रूमिये क़िस्मत कि मैं फिर अब की बरस

रह गया हम-रहे ज़व्वारे मदीना होकर


च-मने त़यबा है वोह बाग़ कि मुर्ग़े सिदरा

बरसों चहके हैं जहां बुलबुले शैदा होकर


सर-सरे दश्ते मदीना का मगर आया ख़्याल

रश्के गुलशन जो बना गुन्चए दिल वा होकर


गोशे शह कहते हैं फ़रियाद रसी को हम हैं

बा’दए चश्म है बख़्शाएंगे गोया होकर


पाए शह पर गिरे या रब तपिशे मेह़र से जब

दिले बेताब उड़े ह़श्र में पारा होकर

 

है येह उम्मीद रज़ा को तेरी रह़मत में शहा

न हो ज़िन्दानिये दोज़ख़ तेरा बन्दा होकर

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