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ज़मीं मैली नहीं होती ज़मन मैला नहीं होता | मुहम्मद के ग़ुलामों का कफ़न मैला नहीं होता

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ज़मीं मैली नहीं होती ज़मन मैला नहीं होता | मुहम्मद के ग़ुलामों का कफ़न मैला नहीं होता

ज़मीं मैली नहीं होती, ज़मन मैला नहीं होता
मुहम्मद के ग़ुलामों का कफ़न मैला नहीं होता

मोहब्बत कमली वाले से वो जज़्बा है सुनो, लोगो !
ये जिस मन में समा जाए, वो मन मैला नहीं होता

मोहब्बत प्यारे आक़ा से वो जज़्बा है सुनो, लोगो !
ये जिस मन में समा जाए, वो मन मैला नहीं होता

नबी के पाक लंगर पर जो पलते हैं कभी उन की
ज़बाँ मैली नहीं होती, सुख़न मैला नहीं होता

गुलों को चूम लेते हैं सहर नम शबनमी क़तरे
नबी की ना'त सुन लें तो चमन मैला नहीं होता

जो नाम-ए-मुस्तफ़ा चूमें, नहीं दुखती कभी आँखें
पहन ले प्यार जो उन का, बदन मैला नहीं होता

तिजोरी में जो रखा है सियाही आ ही जाती है
बटे जो नाम पर उन के वो धन मैला नहीं होता

नबी का दामन-ए-रह़मत पकड़ लो, ए जहाँ वालो !
रहे जब तक ये हाथों में, चलन मैला नहीं होता

मैं नाज़ाँ तो नहीं फ़न पर मगर, नासिर ! ये दा'वा है
सना-ए-मुस्तफ़ा करने से फ़न मैला नहीं होता


शायर:
सय्यिद नासिर हुसैन चिश्ती

ना'त-ख़्वाँ:
शहबाज़ क़मर फ़रीदी
हाफ़िज़ अहमद रज़ा क़ादरी
ग़ुलाम मुस्तफ़ा क़ादरी
Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

KI MUHAMMAD ﷺ SE WAFA TU NE TO HUM TERE HAIN,YEH JAHAN CHEEZ HAI KYA, LAUH O QALAM TERE HAIN.

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