मरहबा ! मरहबा ! मरहबा !
सज गई हर गली, सब मकाँ सज गए
'आशिक़ों की छतों पर है झंडे लगे
हर तरफ़ धूम है, हर तरफ़ है ख़ुशी
आज है हर तरफ़ नूर ही नूर ही
रबी'उन्नूर है, जहाँ मसरूर है
तराने हम ख़ुशी के आज गाएँगे
नबी जी आ गए, जहाँ में छा गए
कि दिल ईमान से अब जगमगाएँगे
बी हलीमा की गोदी का का पाला, आमिना का दुलारा
रहमत-ए-दो-जहाँ बन के आया, ले के क़ुरआन प्यारा
इमाम-उल-अम्बिया, हबीब-ए-किब्रिया
जो दुश्मन को भी सीने से लगाएँगे
नबी जी आ गए, जहाँ में छा गए
कि दिल ईमान से अब जगमगाएँगे
आए सरकार आए !
मेरे दिलदार आए !
मेरे ग़म-ख़्वार आए !
छट गया कुफ़्र का अब अँधेरा, हर तरफ़ है उजाला
गिर गए मुँह के बल सारे बुत भी, आया जब नूर वाला
बुतों को पूजते, जो उन को चूमते
ख़ुदा के आगे वो सर अब झुकाएँगे
नबी जी आ गए, जहाँ में छा गए
कि दिल ईमान से अब जगमगाएँगे
चाँद भी जिन पे क़ुर्बान होगा, कलमा कंकर पढ़ेंगे
हुक्म मानेगा महताब उन का, पेड़ सज्दा करेंगे
कि चेहरा देख कर, फ़िदा होंगे बशर
वो नाबीनों को भी बीना बनाएँगे
नबी जी आ गए, जहाँ में छा गए
कि दिल ईमान से अब जगमगाएँगे
अंबिया ने भी उन की विलादत के हैं मुज़्दे सुनाए
उन की आमद पे जिब्रील ने भी तीन झंडे लगाए
मुनाफ़िक़ जल उठे, चिढ़ें, चिढ़ते रहें
घरों पर हम मगर झंडे लगाएँगे
नबी जी आ गए, जहाँ में छा गए
कि दिल ईमान से अब जगमगाएँगे
एक इब्लीस को छोड़ कर के दोनों 'आलम थे शादाँ
मरहबा मरहबा कह रहे थे सब मलक, जिन्न-ओ-इंसां
ज़माना झूम उठा, मिले जब मुस्तफ़ा
ख़ुशी में आज हम लंगर लुटाएँगे
नबी जी आ गए, जहाँ में छा गए
कि दिल ईमान से अब जगमगाएँगे
उन की आमद पे रब्ब-उल-'उला ने दोनों 'आलम सजाए
उन की आमद के नग़्मे, ए 'आसिम ! हूर-ओ-ग़िल्माँ ने गाए
हुआ मौसम हसीं, महक उठी ज़मीं
कि फ़ज़्ल-ए-रब के अब अनवार छाएँगे
नबी जी आ गए, जहाँ में छा गए
कि दिल ईमान से अब जगमगाएँगे
शायर:
'आसिम-उल-क़ादरी
ना'त-ख़्वाँ:
सय्यिद अर्सलान शाह क़ादरी
रबी'उन्नूर है, जहाँ मसरूर है, तराने हम ख़ुशी के आज गाएँगे

'आशिक़ों की छतों पर है झंडे लगेहर तरफ़ धूम है, हर तरफ़ है ख़ुशीआज है हर तरफ़ नूर ही नूर ही
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