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रोक लेती है आपकी निस्बत, तीर जितने भी हम पे चलते हैं

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रोक लेती है आपकी निस्बत, तीर जितने भी हम पे चलते हैं
 
रोक लेती है आपकी निस्बत, तीर जितने भी हम पे चलते हैं
ये करम है हुज़ूर का हम पर, आने वाले 'अज़ाब टलते हैं 
 
वही भरते हैं झोलियाँ सब की, क्यूंकि वो समझते हैं बोलियां सब की
आओ दरबार-ए-मुस्तफा को चलें, ग़म ख़ुशी में वहीँ पे ढलते हैं
आओ बाज़ार-ए-मुस्तफा को चलें, खोते सिक्के वहीँ पे चलते हैं
 
अपनी औकात सिर्फ इतनी है, कुछ नहीं बात सिर्फ इतनी है
कल भी टुकड़ों पे उनके पलते थे, अब भी टुकड़ों पे उनके पलते हैं
 
अब हमें क्या कोई गिरायेगा, हर सहारा गले लगाएगा
हमने खुद को गिरा दिया है वहाँ, गिरने वाले जहां संभलते हैं 
 
घर वही मुश्कबार होते हैं , ख़ुल्द से हमकिनार होते हैं
ज़िक्र-ए-सरकार के हवालों से, जिन घरों में चराग जलते हैं
 
ज़िक्र-ए-सरकार के उजालों की, बे-निहायत हैं रिफ'अतें ख़ालिद
ये उजाले कभी न सिमटेंगे, ये वो सूरज नहीं जो ढलते हैं
Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

KI MUHAMMAD ﷺ SE WAFA TU NE TO HUM TERE HAIN,YEH JAHAN CHEEZ HAI KYA, LAUH O QALAM TERE HAIN.

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