ख़ुदा की रहमत बरस रही है, हुज़ूर तशरीफ़ ला रहे हैं
फ़रिश्ते घर आमिना का जा कर ख़ुद अपने हाथों सजा रहे हैं
नबी का बचपन था क्या सलोना कि चाँद था आप का खिलौना
कभी खिलौने को तोड़ते हैं, कभी खिलौना बना रहे हैं
दुकानें बू-जहल की हैं जितनी, वो एक भी अब नहीं खुलेंगी
थे जिस में झूटे ख़ुदा उसी में हुज़ूर ताला लगा रहे हैं
बशर बशर उन को कहने वालो ! बशर की कोई मिसाल तो दो
वो डूबे सूरज को सम्त-ए-मग़रिब से देखो वापस बुला रहे हैं
सबा ने पूछा, ऐ फूल ! तेरा लिबास कितना महक रहा है
तो फूल बोला, नबी के तल्वों की हम भी ख़ैरात पा रहे हैं
उन्हीं का का'बा, उन्हीं का तयबा, उन्हीं की दुनिया, उन्हीं का 'उक़्बा
ये सच है, ज़ैनुल ! उन्हीं का सदक़ा जो आज हम लोग खा रहे हैं
शायर:
ज़ैनुल आबिदीन कानपुरी
ना'त-ख़्वाँ:
ज़ैनुल आबिदीन कानपुरी
ख़ुदा की रहमत बरस रही है | हुज़ूर तशरीफ़ ला रहे हैं

ख़ुदा की रहमत बरस रही है, हुज़ूर तशरीफ़ ला रहे हैंफ़रिश्ते घर आमिना का जा कर ख़ुद अपने हाथों सजा रहे हैं
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