या रब ! मेरी सोई हुई तक़दीर जगा दे
आँखें मुझे दी हैं तो मदीना भी दिखा दे
सुनने की जो क़ुव्वत मुझे बख़्शी है, ख़ुदावंद !
फिर मस्जिद-ए-नबवी की अज़ानें भी सुना दे
हूरों की न ग़िल्माँ की न जन्नत की तलब है
मदफ़न मेरा सरकार की बस्ती में बना दे
मुद्दत से मैं इन हाथों से करता हूँ दु'आएँ
इन हाथों में अब जाली सुनहरी वो थमा दे
मुँह हश्र में मुझ को न छुपाना पड़े, या रब !
मुझ को तेरे महबूब की चादर में छुपा दे
'इशरत को भी अब ख़ुश्बू-ए-हस्सान 'अता कर
जो लफ़्ज़ कहे हैं उन्हें तू ना'त बना दे
शायर:
इशरत गोधरवी
ना'त-ख़्वाँ:
फ़रहान अली क़ादरी
फ़ोज़िआ ख़ादिम
राहत फ़तेह अली ख़ान
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