रहमत का वसीला है, बरकत का वसीला हैमौला का दस्तरख्वान है क्या, ने'मत का वसीला हैमेरे घर में सजा है आज मौला का दस्तरख्वान
मैं तो पंजतन का ग़ुलाम हूँमैं तो पंजतन का ग़ुलाम हूँमैं ग़ुलाम-ए-इब्न-ए-ग़ुलाम हूँ
फिर करम हो गया में मदीने चलामें मदीने चला में मदीने चलामदीने चला मदीने चला मदीने चला
मुहम्मद का रोज़ा क़रीब आ रहा हैबुलंदी पे अपना नसीब आ रहा हैफरिश्तों ! ये दे-दो ये पैग़ाम उनको















