या मुहम्मद मुहम्मद मैं कहता रहानूर के मोतियों की लड़ी बन गईआयतों से मिलाता रहा आयतेंफिर जो देखा तो ना'त-ए-नबी बन गई
ज़िंदगी याद-ए-मदीना में गुज़ारी सारी'उम्र भर की ये कमाई है हमारी सारी
ज़माने के हर इक वली ने कहामुझे तो 'अली चाहिएजो हैं हर ज़माने के मुश्किल-कुशा
मीराँ मीराँ मीराँ मीराँ हमारी है दु'आ, शह-ए-ग़ौस-उल-वरा हरा भरा रहे ये क़ादरी चमन
आक़ा आ जाइये आक़ा आ जाइयेआक़ा आ जाइये आक़ा आ जाइयेबेहरे दीदार मुश्ताक़ है हर नज़रदोनों आलम के सरकार आ जाइये
ज़हे-क़िस्मत जो आ जाए क़ज़ा आक़ा की चौखट परमुकम्मल मौत का आए मज़ा आक़ा की चौखट पर
शब-ए-बारात के आमाले नवाफिलरोज़े की फजीलतः शाबान की 15 तारीख को रोज़ा रखने की बड़ी फजीलत है।
















