सर-ए-महफ़िल करम इतना मेरी सरकार हो जाएनिगाहें मुन्तज़िर रह जाएं और दीदार हो जाएतसव्वुर में तेरी हर शय पे यूँ नज़रें जमाता हूँ
सरदार-ए-औलिया हैं मेरे गौस पिया जिलानीवो महबूब-ए-सुब्हानी , शहबाज़-ए-ला-मकानीवो किन्दील-ए-नूरानी
ग्यारवीं वाले मेरे ग्यारवीं वालेइमदाद कुन इमदाद कुन अज़ बंदे ग़म आज़ाद कुनदर दीं और दुनिया शाद कुन या ग़ौसे आज़म दस्तगीर
सरे शाम ही से फलक के सितारेयही कह रहे हैं चमकते चमकतेदिखाएंगे शाम-ओ-कमर को भी आंखेंमदीने के ज़र्रे दमकते दमकते
सुनते हैं के महशर में सिर्फ उनकी रसाई हैगर उनकी रसाई है लो जब तो बन आई हैमचला है के रहमत ने उम्मीद बंधाई हैक्या बात तेरी मुजरिम क्या बात बनाई है
मंज़िल मिले उस राह की पहचान इश्क़ हैआँखों में हसरतों की जगह पर उम्मीद होहो जिस से भला सबका कुछ ऐसी नवीद हो
रमजान महेरबान रमजान महेरबानरमजान महेरबान रमजान महेरबानरमजान महेरबान है रमजान महेरबानइस्लाम की पहचान है रमजान महेरबान
पाँवे कल कर देते पाँवे आज कर देरब्बा मेरेयां नसीबां विच हज कर दे
रश्के कमर हूँ रंगे रूखे आफताब हूँज़र्रा तेरा जो अये शहे गर्दो जनाब हूँदर्रे नजफ़ हूँ गोहरे पाके खुशाब हूँयानी तुराबे रह-गुज़रे बु-तुराब हूँ
















