रूह-ए-शब्बीर वो मंजर तो बताजब हुई शहर-ए-मदीना से जुदाई होगीये तो ज़ैनब ही बता सकती हैलौट कर कैसे मदीने में वो आई होगी
रब्ब-ए-सल्लिम की सदाएं गुन-गुनाते जाएंगेरब्ब-ए-हब्ली उम्मती की रट लगाते जाएंगेहम गुनाहगारों को रब्ब से बख्शवाते जाएंगे
क़ब्र जिस दम मेरी तैयार कराई जाएख़ाक थोड़ी सी मदीने की भी डाली जाएआब-ए-ज़मज़म हो मयस्सर तो ग़ुस्ल दे देनाचादर-ए-कफ़न भी तैबा से मंगाई जाए
Padho Durood ke Maulud ki Gadi aayi Padho Durood ke Maulud ki Gadi aayiYa Rasulallah Salla Alay Salla AlayYa Habiballah Salla Alay Sallam Alay
पुल से उतारो रह गुज़र को खबर न होजिब्रील पर बिछाएँ तो पर को खबर न होकाँटा मेरे जिगर से गमे रोज़गार कायूँ खींच लीजिये के जिगर को खबर न हो















